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पशु-संवर्धन पर्व

गौहरी — पशु-संवर्धन पर्व

जब पशुओं की सेवा ही पूजा बन जाती है

परंपरा

गौहरी — पशुओं के प्रति कृतज्ञता का उत्सव

गौहरी झाबुआ के आदिवासी समाज का एक अनूठा पर्व है जो गायों और अन्य पशुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन पशुओं को नहलाया जाता है, उनके सींगों को रंगा जाता है और उनकी विशेष पूजा की जाती है।

गौहरी का संदेश है कि पशु हमारी जीवनधारा हैं — वे खेती में मदद करते हैं, दूध देते हैं और हमारे जीवन का हिस्सा हैं। इनके प्रति कृतज्ञता और सेवा करना हमारा धर्म है।

Gauhari is the tribal festival honouring cattle and livestock. Cows are bathed, their horns are painted with colours, and special prayers are offered. The festival celebrates the bond between humans and animals and expresses gratitude for the role of cattle in sustaining rural life.

गौहरी — पशु-संवर्धन पर्व

मुख्य विशेषताएं

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पशु पूजन

गायों और पशुओं को सजाकर उनकी विशेष पूजा की जाती है।

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रंगारंग श्रृंगार

पशुओं के सींगों को रंगकर और फूलों से सजाकर उनका सम्मान किया जाता है।

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मानव-पशु संबंध

यह पर्व मनुष्य और पशु के बीच के गहरे सहजीवन संबंध को दर्शाता है।

पशु-संवर्धन की आदिवासी दृष्टि

गौहरी आदिवासी समाज की उस दृष्टि को सामने रखती है जहाँ पशु केवल उत्पाद नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं। पशुओं के प्रति यह संवेदनशीलता आधुनिक समाज के लिए भी एक सीख है।

भारत घुमक्कड़ गौहरी पर्व का दस्तावेजीकरण कर पशु-संवर्धन की इस अनूठी परंपरा को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

पशु-संवर्धन की परंपरा से सीखें

गौहरी का संदेश — पशुओं के प्रति कृतज्ञता और सेवा — आज की दुनिया के लिए अनमोल है।

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