A grassroots foundation in Jhabua, Madhya Pradesh — preserving the indigenous knowledge, culture and self-reliant enterprise of the Bhil and Bhilala communities.
"परम्परा और उद्यम के बीच संवाद का एक मंच"
A two-day collaborative platform where culture, enterprise, research and youth meet. An assembly where tradition meets modern opportunity for students, researchers, artists and local entrepreneurs of the Jhabua region.
From sacred Matavan forests to the vibrant colours of Bhagoria — Jhabua seen through our lens.
From tribal identity to grain conservation — each dimension is a living thread in the fabric of Jhabua's future.
झाबुआ के भील और भीलाला समुदाय की वे परंपराएँ जो सदियों से जीवंत हैं

हजारों साल से जंगल की रक्षा करने के लिये हमारी परम्परा रही है मातावन — यानी माता का घर। झाबुआ के प्रत्येक गाँव में मातावन है। मान्यता के अनुसार कोई भी व्यक्ति मातावन में से लकड़ी नहीं काटेगा।
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गाँव में जब कोई परिवार किसी संकट से उबर नहीं पाता था, तब सभी ग्रामवासी निःस्वार्थ भाव से मिलजुलकर उसे उबार लेते थे। परमार्थ की महान भीली परम्परा।
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भारतीय प्राचीन जनजातीय संस्कृति का जीवंत उत्सव। होली से पूर्व झाबुआ-अंचल में आदिवासी समाज द्वारा — समुदाय, एकता, प्रकृति और स्वावलंबन का प्रतीक।
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होली का असली रंग जनजातीय गाँवों में बसता है। यह पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और सामूहिक एकता का उत्सव है।
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झाबुआ अंचल में आस्था का अद्भुत लोकपर्व — गल बाबजी धुलेटी पर मनाया जाता है। गाँव-गाँव की भागीदारी, नृत्य, भक्ति और परंपरा।
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नई फसल तैयार होने पर तब तक अन्न-ग्रहण नहीं किया जाता, जब तक समाज सामूहिक रूप से प्रकृति और देवशक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त न कर दे।
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दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला पवित्र पशु-संवर्धन पर्व। गाय-बैल को फूलों, रंगों, मोरपंख और घुंघरुओं से सजाया जाता है।
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भील समाज की विवाह परंपरा में भराड़ी एक पवित्र लोककला है — दीवारों पर बनाए जाने वाले यह चित्र नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक हैं।
और जानें →झाबुआ — भील समुदाय की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक धरा, जहाँ परंपरा, प्रकृति और मानव जीवन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह केवल एक जिला नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है।
उत्तर में माही नदी, दक्षिण में पवित्र माँ नर्मदा, पहाड़ियाँ, घने जंगल और हजारों वर्षों की ऐतिहासिक विरासत — झाबुआ अंचल को जानिए।
यहाँ के भील और भीलाला समुदाय ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो ज्ञान, कला और परंपराएँ सँजोई हैं — वह दुनिया की किसी भी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलतीं। झाबुआ अपनी मिट्टी, अपने उत्सव और अपने लोगों में अनूठा है।
हम विकास नहीं, जीवन दर्शन को बचाने का काम कर रहे हैं
Bharat Ghumakkad Samaj Darshan Foundation is dedicated to preserving, documenting, and celebrating the indigenous knowledge, culture, and enterprise of Jhabua's tribal communities — the Bhil and Bhilala peoples of western Madhya Pradesh.
हम मानते हैं कि जनजातीय ज्ञान — चाहे वह वनस्पति विज्ञान हो, कृषि हो, कला हो या सामुदायिक शासन — मानवता की साझा धरोहर है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
"अगर आज जनजातीय ज्ञान नहीं बचा, तो आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति से जुड़ने का रास्ता खो देंगी।"
झाबुआ आने वालों के अनुभव — उन्हीं की ज़ुबानी
वनवासी होली महापर्व के अवसर पर झाबुआ अंचल के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण मेरे लिए अत्यंत अद्भुत और रोमांचकारी अनुभव रहा। भारत घुमक्कड़ के माध्यम से वनवासी जीवन, परंपराओं और संस्कृति को नजदीक से जानने और जीने का अवसर मिला। आधुनिकता के इस दौर में भी यहाँ की परंपरागत जीवनशैली, खान-पान और सामाजिक मूल्यों का जीवंत बने रहना अत्यंत प्रेरणादायक है। यह यात्रा न केवल ज्ञानवर्धक रही, बल्कि आत्मीयता और अपनत्व से भरपूर एक यादगार अनुभव भी बनी। इस सफल आयोजन के लिए राजेन्द्र जी डिंडोड एवं समस्त साथियों का हृदय से आभार।
पिछले दो वर्षों से हम भगोरिया को देखने और समझने के लिए झाबुआ अंचल जा रहे थे, लेकिन इस बार भारत घुमक्कड़ टीम के सहयोग से जनजातीय जीवन को और अधिक करीब से देखने-समझने का अवसर मिला। जो भगोरिया दूर से केवल एक उत्सव दिखाई देता है, वह वास्तव में प्रेम, सहअस्तित्व, प्रकृति और सामुदायिक संतुलन का जीवंत दर्शन है। यह यात्रा हमारे लिए मिथ्या से सत्य की ओर बढ़ने जैसी रही — इसी अनुभव को हमने अपनी documentary "भगोरिया: मिथक से सत्य तक" में सहेजने का प्रयास किया है।
संजय जी एवं राजेंद्र जी के नेतृत्व में जनजातीय दर्शन यात्रा ने हमें भील जनजाति की समृद्ध संस्कृति, प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली, पारंपरिक व्यंजनों और पिथोरा चित्रकला जैसी अद्भुत लोक परंपराओं से परिचित कराया। यह अनुभव किताबों में दिखाई गई छवि से कहीं अधिक प्रेरणादायक और जीवंत था। भील समाज आज भी प्रकृति संरक्षण, आत्मनिर्भरता, कला, शिक्षा और ग्रामीण उद्यमिता में मिसाल बनकर उभर रहा है। भारत घुमक्कड़ समूह का यह प्रयास जनजातीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने की एक सुंदर पहल है। हृदय से आभार एवं शुभकामनाएँ।
For the first time, I visited Salarpada in Jhabua and experienced a kind of warmth that felt rare and deeply human. The people welcomed me with so much care, love, and innocence — always asking if I had eaten, making me feel completely safe among strangers. Dancing with a 70+ year old aunty with unstoppable energy was unforgettable! Despite limited facilities, the community felt happier, calmer, and deeply connected to nature. Sleeping under the moonlit sky on a khatiya, eating delicious makki ki roti, and spending time in the open fields became memories I'll always cherish. Their way of life teaches us something important — to live simply, lovingly, and in harmony with nature.
झाबुआ संवाद कार्यक्रम में जब मैंने पहली बार पिठोरा चित्रकला के पीछे की कहानी सुनी, तो मुझे एहसास हुआ कि हम एक अत्यंत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को खोने के कगार पर खड़े हैं। इस फाउंडेशन का काम इसे बचाने का सबसे सच्चा प्रयास है।